सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Monday, February 20, 2012

आवाज टंकार बन चुकी हैं

कल
औरत
एक आवाज थी
दबा दी जाती थी

आज
औरत
एक टंकार हैं

अब लोग दबा रहे हैं
अपने कान
ताकि
टंकार सुनाई ना दे

कल की औरत की आवाज
आज की औरत की
टंकार बन चुकी हैं



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15 comments:

राजन said...

बिल्कुल सही बात!
समाज में महिलाओं को लेकर एक असुरक्षा तो हैं.सिर्फ इसलिए नहीं कि औरत अब विरोध कर रही हैं बल्कि इसलिए भी कि वह अब कुछ भी पर्सनल ही नहीं रहने दे रही हैं बल्कि उसे पॉलिटिकल भी बना रही हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
ओम् नमः शिवाय!
महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ!

प्रतुल वशिष्ठ said...

@

यदि कल

औरत

एक आवाज थी

दबा दी जाती थी... तो वही पनपाती थी... दोनों लताओं को.

— उच्छृंखल आचरणों से निकले कलहान्तरित आलापों के बीच शालीनता की अमृत लता, और

— कोमलकान्ताओं के हितैषी कटु स्वरों के बीच जन्मी भयाक्रांत विष बेल.

प्रतुल वशिष्ठ said...
This comment has been removed by the author.
प्रतुल वशिष्ठ said...

@

हाँ, आज

औरत

एक टंकार है.... तभी शांत खड़े वृक्ष भी अपनी उन टहनियों को देते दुत्कार हैं...

जो टंकार करने वाली प्रत्यंचाओं के साथ बैंत बनकर करते ललकार हैं.

प्रतुल वशिष्ठ said...

@

अब लोग दबा रहे हैं

अपने कान

ताकि

टंकार सुनाई ना दे..... न केवल इसलिये अपितु इसलिये भी कि

बैंत बने पुरुष के लचीलेपन को नज़रंदाज़ किया जा रहा है.

प्रत्यंचा का कसाव बैंत के लचीलेपन से ही तो संभव है.

एक का जितना अधिक लचीलापन

दूसरे की उतनी ही अधिक ताकत.......... है न कमाल का रूपक.

प्रतुल वशिष्ठ said...

@

कल की औरत की आवाज

आज की औरत की

टंकार बन चुकी है..... या यूँ कहें कि कल की औरत का दबापन

दबते-दबते आज विस्फोट रूप ले रहा है....

प्रतुल वशिष्ठ said...

'विचार' तो तमाम उठ खड़े हुए हैं... लेकिन उन्हें दबाकर शांत करना काव्य-भावों पर टिप्पणियों की आचार संहिता का पालन कहूँगा.

— सच है दबाव से दब्बूपना विकसता है... लेकिन यह भी सच है कि दबाव से संस्कार भी पड़ता है.

रश्मि प्रभा... said...

हद से बात गुजर जाए तो यही होता है...

सदा said...

बिल्‍कुल सही कहा है आपने ...

नीरज गोस्वामी said...

इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

नीरज

vidya said...

पहले औरत सिर्फ झंकार थी....
मजबूर कर दी गयी टंकार बन जाने को....

सुन्दर रचना..

Sunil Kumar said...

भावपूर्ण रचना, बधाई ..........

vandana said...

सच कहा आपने

personalconcerns said...

itna vidwesh!