सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Saturday, August 22, 2009

'प्रतिभा' ~ रश्मि स्वरुप

'प्रतिभा'


वह शांत थी अनजान थी
और उससे भी अधिक गुमनाम थी
घनघोर अँधेरे में रोशनी का एक कतरा गया
उसे जगाया गया, सहलाया गया
पर संकोच की परतों में वह, ढंकी रही, छिपी रही
पहचान तो गयी खुद को, पर सबकी नजरों से बची रही
ठहर ठहर के उसे ललकारा और उभारा गया
आ दिखा जौहर अपना, कहकर उसे पुकारा गया
मान अटल इस पुकार को, कठिन साधना से निखरी
ओजस्वी उसका आत्मबल, किरणें जिसकी बिखरी
आखिर जम कर चमकी गगन में, नजरो में उसकी कौंध चुभी
वो तो नहाई रोशनी में, औरों को उसकी चकाचौंध चुभी
लेकर आड़ खुबसूरत परन्तु खोखली बातों की, दुहाई दी,
फुसलाया और डराया भी
बनी रही जब हठी तनिक वह, ज़रा उसे बहलाया भी
चकित हुई दोहरे बर्ताव से, हताश हुई, दुःख की हुँकार उठी
चख लिया था स्वाद उसने स्वतंत्रता का, कुचले जाने पर फुंफकार उठी
अंत किया इस द्वंद का, की सिंहनी सी गर्जना
जन्म लिया विद्रोह ने, तोड़ दी ये वर्जना
बीत गयी रात अन्धकार की, ये सुनहरी प्रभा है
ना छिप सकेगी, न दबेगी, ये अदम्य प्रतिभा है...!
~ रश्मि स्वरुप


रश्मि स्वरुप ने भेजी हैं लिंक हैं
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Saturday, August 15, 2009

रहस्यमयी



उम्र कोई हो,
एक लड़की-
१६ वर्ष की,
मन के अन्दर सिमटी रहती है...
पुरवा का हाथ पकड़
दौड़ती है खुले बालों मे
नंगे पाँव....
रिमझिम बारिश मे !
अबाध गति से हँसती है
कजरारी आंखो से,
इधर उधर देखती है...
क्या खोया? - इससे परे
शकुंतला बन
फूलों से श्रृंगार करती है
बेटी" सज़ा-ए-आफ़ता पत्नी" बनती होगी
पर यह,
सिर्फ़ सुरीला तान होती है!
यातना-गृह मे डालो
या अपनी मर्ज़ी का मुकदमा चलाओ ,
वक्त निकाल ,
यह कवि की प्रेरणा बन जाती है ,
दुर्गा रूप से निकल कर
" छुई-मुई " बन जाती है-
यह लड़की!
मौत तक को चकमा दे जाती है....
तभी तो
"रहस्यमयी " कही जाती है...!

Thursday, August 6, 2009

मुझसे सुंदर कौन??????????

मैं हूँ पायल,
मैं हूँ गीत,
रिमझिम-रिमझिम बारिश हूँ..
।मैं हूँ खनकती पुरवाई,
मैं ही बसंत की खुशबू हूँ...
मैं हूँ आँगन,
मैं हूँ पवन,
मैं ही बाबुल की दुनिया हूँ....
मैं हूँ ममता का दूजा रूप,
भाई की कलाई की डोरी हूँ,
मैं हूँ शक्ति,
मैं विद्या हूँ,
मैं ही लक्ष्मी का रूप हूँ....
बुलबुल हूँ,
गौरैया हूँ,
कोयल की गूंजती कूक हूँ....
धरती में हूँ,
अम्बर पे हूँ,
मुझसे सुंदर कौन?
थामलो मेरा हाथ,
मुझसे कर लो बात,
मैं ही मन हूँ,
मैं हूँ जीवन,
धड़कनों के संग-संग हूँ....
क्यूँ मुझको यूँ खोते हो,
मुझसे सुंदर कौन?
कहो...मुझसे सुंदर कौन??????????

Saturday, August 1, 2009

जीत निश्चित है !

बाल-विवाह , सती-प्रथा ,
अग्नि-परीक्षा........................
जाने कितने अंगारों से गुजरी
ये मासूम काया !
यातनाओं के शिविर में,
विरोध की शिक्षा ने ,
उसे संतुलन दिया ,
शरीर पर पड़े निशानों ने
'स्व' आकलन का नजरिया दिया !
हर देहरी पर ,
'बचाव' की गुहार लगाती,
अपशब्दों का शिकार होती,
लान्छ्नाओं से धधकती नारी ने
अपना वजूद बनाया.........
माँ सरस्वती से शिक्षा,
दुर्गा से नवशक्ति ली ,
लक्ष्मी का आह्वान किया-
प्रकाशपुंज बनकर ख़ुद को स्थापित किया !
समाज का दुर्भाग्य -
उसकी शक्ति,उसकी क्षमताओं से परे
ह्त्या पर उतर आया !
आज फिर ,
कुरुक्षेत्र का मैदान है ,
और कृष्ण नारी सेना के सारथी............
यकीनन,
जीत निश्चित है !