सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Sunday, July 20, 2008

एक और औरतो की पीढी

सदियों से मानसिक रूप से परतंत्र
नही उबर पाती हैं
अपनी इस मानसिकता से
जो अधिकार हक़ से उसके हैं
उनको पाने के लिये छल करती हैं
सदियों से छल ही तो करती आयी हैं
पर ये भूल जाती हैं कि हर छल मे
छली वही जाती हैं
सोचती हैं पति के अहम् को बढ़ावा दे दूँ
उससे डर कर रहने का नाटक कर लूँ
क्या मेरा जायेगा , जीवन मेरा तो
सुख सुविधा से कट जायेगा
कभी क्यो जीवन जीने का नहीं सोचती
त्रिया चरित्र का लाछन ले कर
क्या कभी जीवन जीने का सुख
वो पाएगी या एक और
औरतो की पीढी
बिना अधिकार अपने भोगे
दुनिया से जीवन काट कर चली जायेगी

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

1 comment:

Manvinder said...

Rachana ji. ek khaas kisam di pidi sach mai khadi ho chuki hai, apki parstuti achhi hai.es ko jaari rakhain
Manvinder